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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्याम्) जिस [भूमि] पर (पूर्वे) निवासस्थान [शरीर] में [वर्तमान] (भूतकृतः) यथार्थ कर्म करनेवाले, (वेधसः) ज्ञानवान् (सप्त) सात (ऋषयः) विषय प्राप्त करनेवाले ऋषियों [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] ने (सत्त्रेण) सत्पुरुषों के रक्षक (यज्ञेन) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] और (तपसा सह) [ब्रह्मचर्य आदि] तप के साथ (गाः) वेदवाणियों को (उत्) उत्तमता से (आनृचुः) पूजा है ॥३९॥
भावार्थभाषाः - जिस भूमि पर मनुष्य अपने शरीर की इन्द्रियों द्वारा वेदज्ञान प्राप्त करके आत्मोन्नति करते हैं, उस भूमि पर हम पुरुषार्थ करके सुख प्राप्त करें−मन्त्र ४० देखो ॥३९॥ यजुर्वेद ३४।५५। में वर्णन है−(सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे) सात ऋषि अर्थात् शब्द आदि विषय को प्राप्त करनेवाले पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन और बुद्धि शरीर में प्रतीति के सात ठहरे हुए हैं ॥
टिप्पणी: ३९−(यस्याम्) भूम्याम् (पूर्वे) पूर्व निवासे निमन्त्रणे च−अच्। निवासे शरीरे (भूतकृतः) भूतं यथार्थं कुर्वन्ति ये ते (ऋषयः) अ० ४।११।९। विषयप्रापकाः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि मनो बुद्धिश्च (गाः) वेदवाणीः (उत्) उत्तमतया (आनृचुः) अर्च पूजायाम्−लिट्। अपस्पृधेथामानृचुरानृहु०। पा० ६।१।३६। धातोर्लिटि उसि सम्प्रसारणमकारलोपश्च। यद्वृत्तान्नित्यम्। पा० ८।१।६६। इति निघातप्रतिषेधः। आनर्चुः। पूजितवन्तः (सप्त) सप्तसंख्याकाः (सत्त्रेण) सत्+त्रैङ् पालने−क। सतां सत्पुरुषाणां त्रायकेण (वेधसः) मेधाविनः ज्ञानवन्तः (यज्ञेन) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारेण (तपसा) ब्रह्मचर्यादितपश्चरणेन (सह) ॥
