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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भूमे) हे भूमि ! (यत्) जो कुछ (ते) तेरा (विखनामि) मैं खोद डालूँ, (तत्) वह (क्षिप्रम् अपि) शीघ्र ही (रोहतु) उगे। (विमृग्वरि) हे खोजने योग्य ! (मा) न तो (ते) तेरे (मर्म) मर्म स्थल को और (मा) न (ते) तेरे (हृदयम्) हृदय को (अर्पिपम्) मैं हानि करूँ ॥३५॥
भावार्थभाषाः - भूतलविद्या और भूगर्भविद्या में चतुर लोग भूमि को उचित रीति से खोदकर और हल से जोतकर रत्न और अन्न आदि पदार्थ प्राप्त करें ॥३५॥
टिप्पणी: ३५−(यत्) यत् किञ्चित् (ते) तव (भूमे) (विखनामि) विदारयामि (क्षिप्रम्) शीघ्रम् (तत्) (अपि) एव (रोहतु) उत्पद्यताम् (मा) निषेधे (ते) तव (मर्म) सन्धिस्थानम् (विमृग्वरि) म० २९। हे अन्वेषणीये (ते) (हृदयम्) (मा) (अर्पिपम्) ऋ गतौ हिंसायां च−णिचि पुकि लुङि रूपम्। न हिनसानि ॥
