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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्याम्) जिस [पृथिवी] पर (वानस्पत्याः) वनस्पतियों [बड़े-बड़े पेड़ों] से उत्पन्न हुए (वृक्षाः) वृक्ष (ध्रुवाः) दृढ़ होकर (विश्वहा) अनेक प्रकार (तिष्ठन्ति) ठहरते हैं (विश्वधायसम्) [उस] सब की धारण करनेवाली, (धृताम्) [वीरों से] धारण की गयी (पृथिवीम्) पृथिवी को (अच्छावदामसि) स्वागत करके हम आवाहन करते हैं ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जिस पृथिवी पर हमारे उपकार के लिये फल फूल पत्र आदिवाले वृक्ष उत्पन्न होते हैं, उसकी सावधानी हम सदा करते रहें ॥२७॥
टिप्पणी: २७−(यस्याम्) पृथिव्याम् (वृक्षाः) वृक्ष वरणे−अच्। स्वीकरणीयास्तरवः (वानस्पत्याः) अ० ३।६।६। वनस्पति-ण्य। वनस्पतिभ्योऽश्वत्थादिभ्य उत्पन्नाः (ध्रुवाः) दृढाः सन्तः (तिष्ठन्ति) (विश्वहा) अनेकधा (पृथिवीम्) (विश्वधायसम्) अ० ३।२२।२। सर्वधारयित्रीम् (धृताम्) वीरपुरुषैर्धारिताम् (अच्छावदामसि) अ० ६।५९।३। अच्छ सुष्ठु स्वागतेन आवदामः आह्वयामः ॥
