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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भूमिः) भूमि (शिला) शिला, (अश्मा) पत्थर और (पांसुः) धूलि है, (सः) वह (संधृता) यथावत् धारण की गयी (भूमिः) भूमि (धृतः) धरी हुई है। (तस्यै) उस [हिरण्यवक्षसे] सुवर्ण आदि धन छाती में रखनेवाली (पृथिव्यै) पृथिवी के लिये (नमः अकरम्) मैंने अन्न किया [खाया] है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जिस भूमि पर अनेक बड़े-छोटे पदार्थ हैं और जिस में अनेक रत्न भरे हैं, उस पृथिवी के हित के लिये मनुष्य अन्न जल आदि पदार्थ खावें ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(शिला) क्षुद्रपाषाणः (भूमिः) (अश्मा) प्रस्तरः (पांसुः) धूलिः (सा) (भूमिः) (संधृता) सम्यग् धारिता (धृता) स्थिरा (तस्यै) (हिरण्यवक्षसे) हिरण्यानि सुवर्णादीनि रत्नानि वक्षसि−मध्ये यस्यास्तस्यै (पृथिव्यै) (अकरम्) कृतवानस्मि (नमः) अन्नम्−निघ० २ ॥
