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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निवासाः) अग्नि के साथ निवास करनेवाली [अथवा अग्नि के वस्त्रवाली], (असितज्ञूः) बन्धनरहित कर्म को [जतानेवाली] (पृथिवी) पृथिवी (मा) मुझ को (त्विषिमन्तम्) तेजस्वी और (संशितम्) तीक्ष्ण [फुरतीला] (कृणोतु) करे ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जैसे भूमि भीतर और बाहिर सूर्यताप से बल पाकर अपने मार्ग पर बेरोक चलती रहती है, वैसे ही मनुष्य भीतरी और बाहिरी बल बढ़ाकर सुमार्ग में बढ़ता चले ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(अग्निवासाः) वसेर्णित्। उ० ४।११८। वस निवासे आच्छादने च−असुन्। अग्निना तापेन सह निवासो यस्याः सा। यद्वा, तापो वस्त्रं यस्याः सा (पृथिवी) (असितज्ञूः) षिञ् बन्धने−क्त+ अन्दूदृम्फूजम्बू०। उ० १।९३। ज्ञा विज्ञापने−कू। अबद्धं कर्म ज्ञापयति बोधयति नियोजयति वा सा (त्विषिमन्तम्) दीप्तिमन्तम् (संशितम्) तीक्ष्णीकृतम् (मा) माम् (कृणोतु) करोतु ॥
