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अ॒ग्निर्दि॒व आ त॑पत्य॒ग्नेर्दे॒वस्यो॒र्वन्तरि॑क्षम्। अ॒ग्निं मर्ता॑स इन्धते हव्य॒वाहं॑ घृत॒प्रिय॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्नि: । दिव: । आ । तपति । अग्ने: । देवस्य । उरु । अन्तरिक्षम् । अग्निम् । मर्तास: । इन्धते । हव्यऽवाहम् । हव्य ऽवाहम् । घृतऽप्रियम् ॥१.२०॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:20


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राज्य की रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) अग्नि [ताप] (दिवः) सूर्य से (आ तपति) आकर तपता है, (देवस्य) कामनायोग्य (अग्नेः) अग्नि का (उरु) चौड़ा (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष [अवकाश] है। (हव्यवाहम्) हव्य [आहुति के द्रव्य अथवा नाड़ियों में अन्न के रस] को ले चलनेवाले, (घृतप्रियम्) घृत के चाहनेवाले (अग्निम्) अग्नि को (मर्तासः) मनुष्य लोग (इन्धते) प्रकाशमान करते हैं ॥२०॥
भावार्थभाषाः - वह अग्नि ताप भूमि में [म० १९] सूर्य से आता है, तथा आकाश के पदार्थों में प्रवेश करके उन्हें बलयुक्त करता है। उस अग्नि को मनुष्य आदि प्राणी भोजन आदि से शरीर में बढ़ा कर पुष्ट और बलवान् होते हैं। तथा उसी अग्नि को हव्यद्रव्यों से प्रज्वलित करके मनुष्य वायु, जल और अन्न को शुद्ध निर्दोष करते हैं ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(अग्निः) तापः (दिवः) सूर्यात् (आ) आगत्य (तपति) दहति (अग्नेः) तापस्य (देवस्य) कमनीयस्य (उरु) विस्तृतम् (अन्तरिक्षम्) अवकाशः (अग्निम्) (मर्तासः) मनुष्याः (इन्धते) दीपयन्ति (हव्यवाहम्) होमद्रव्यस्य अन्नरसस्य वा वाहकम् (घृतप्रियम्) घृतेच्छुकम् ॥