पदार्थान्वयभाषाः - (मानवानाम्) मानवालों वा मननशीलों के (असंबाधम्) गति रोकनेवाले व्यवहार को (बध्यतः) मिटाती हुई (यस्याः) जिस [पृथिवी] के [मध्य] (उद्वतः) ऊँचे और (प्रवतः) नीचे देश और (बहु) बहुत से (समम्) सम स्थान हैं। (या) जो (नानावीर्याः) अनेकवीर्य [बल]वाली (ओषधीः) ओषधियों [अन्न, सोमलता आदि] को (बिभर्ति) रखती है, (पृथिवी) वह पृथिवी (नः) हमारे लिये (प्रथताम्) चौड़ी होवे और (नः) हमारे लिये (राध्यताम्) सिद्धि करे ॥२॥
भावार्थभाषाः - विचारशील मनुष्य पृथिवी पर ऊँचे, नीचे और सम स्थानों में विघ्नों को मिटाकर अन्न आदि पदार्थ प्राप्त करके कार्यसिद्धि करते जाते हैं ॥२॥ (बध्यतः) शब्द के स्थान पर गवर्नमेन्ट बुक् डिपो बम्बई के पदपाठ में [मध्यतः] शब्द है। हम ने अजमेर वैदिक यन्त्रालय और सेवकलाल कृष्णदास के संहितापाठ के अनुसार (बध्यतः) पद मानकर अर्थ किया है ॥