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देवता: भूमिः ऋषि: अथर्वा छन्द: उरोबृहती स्वर: भूमि सूक्त

अ॒ग्निर्भूम्या॒मोष॑धीष्व॒ग्निमापो॑ बिभ्रत्य॒ग्निरश्म॑सु। अ॒ग्निर॒न्तः पुरु॑षेषु॒ गोष्वश्वे॑ष्व॒ग्नयः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्नि: । भूम्याम् । ओषधीषु । अग्निम् । आप: । बिभ्रति । अग्नि: । अश्मऽसु । अग्नि: । अन्त: । पुरुषेषु । गोषु । अश्वेषु । अग्नय: ॥१.१९॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:19


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राज्य की रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (भूम्याम्) भूमि में [वर्तमान] (अग्निः) अग्नि [ताप] (ओषधीषु) ओषधियों [अन्न सोमलता आदि] में है, (अग्निम्) अग्नि को (आपः) जल (बिभ्रति) धारण करते हैं, (अग्निः) अग्नि (अश्मसु) पत्थरों [वा मेघों] में है। (अग्निः) अग्नि (पुरुषेषु अन्तः) पुरुषों के भीतर है, (अग्नवः) अग्नि [के ताप] (गोषु) गौओं में और (अश्वेषु) घोड़ों में हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरनियम से पृथिवी में का अग्निताप अन्न आदि पदार्थों और प्राणियों में प्रवेश करके उन में बढ़ने तथा पुष्ट होने का सामर्थ्य देता है ॥१९॥ यहाँ पर अथर्व० ३।२१।१, २। भी देखो ॥
टिप्पणी: १९−(अग्निः) अग्नितापः (भूम्याम्) पृथिव्याम् (ओषधीषु) अन्नसोमलतादिषु (अग्निम्) तापम् (आपः) जलानि (बिभ्रति) धारयन्ति (अग्निः) (अश्मसु) अ० १।२।२। पाषाणेषु। मेघेषु−निघ० १।१०। (अग्निः) (अन्तः) मध्ये (पुरुषेषु) (गोषु) (अश्वेषु) (अग्नयः) अग्नितापाः ॥