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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (समग्राः) सब (ताः) वे (प्रजाः) प्रजाएँ (नः) हमें (सम् दुह्रताम्) मिलकर भरपूर करें, (पृथिवि) हे पृथिवी ! (वाचः) वाणी की (मधु) मधुरता (मह्यम्) मुझ को (धेहि) दे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वाणी की मधुरता अर्थात् सत्य वचन आदि से सब प्राणियों से उपकार लेते हैं, वे सुख पाते हैं ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(ताः) (नः) अस्मान् (प्रजाः) प्राणिनः (सम्) मिलित्वा (दुह्रताम्) प्रपूरयन्तु (समग्राः) समस्ताः (वाचः) वचनस्य (मधु) माधुर्यम् (पृथिवि) (धेहि) देहि (मह्यम्) ॥
