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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (करूकरम्) कार्यकर्ता (पुत्रम्) पुत्र (पतिम्) पति, (भ्रातरम्) भाई (आत्) और (स्वान्) बन्धुओं को (संकर्षन्ती) समेटती हुई और (मनसा) मन से (इच्छन्ती) चाहती हुई [माता, पत्नी, भगिनी आदि स्त्री] (अर्बुदे) हे अर्बुदि ! [शूर सेनापति-म० १] (ते) तेरे (रदिते) तोड़ने-फोड़ने पर, [रोवे-म० ७] ॥८॥
भावार्थभाषाः - शूर सेनापति से शत्रुओं के मारे जाने पर उनकी स्त्रियाँ अपने घरों के कार्यकर्ताओं के बिना अत्यन्त दुःखी होवें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(संकर्षन्ती) सम्यग् गृह्णन्ती (करूकरम्) कृषिचमितनि०। उ० १।८०। करोतेः-ऊ प्रत्ययः स्त्रियाम्। कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु। पा० ३।२।२०। करोतेष्टः। करूं क्रियां करोतीति करूकरस्तं कार्यकर्तारम् (मनसा) हृदयेन (पुत्रम्) सुतम् (इच्छन्ती) कामयमाना (पतिम्) (भ्रातरम्) सहोदरम् (आत्) तथा (स्वान्) ज्ञातीन्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ७ ॥
