0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रतिघ्नाना) [शिर आदि] धुनती हुई, (अश्रुमुखी) मुख पर आँसू बहाती हुई, (कृधुकर्णी) मन्द कानोंवाली (च) और (विकेशी) केश बिखरे हुए [शत्रु की माता, पत्नी बहिन आदि] (पुरुषे हते) [अपने] पुरुष के मारे जाने में, (अर्बुदे) हे अर्बुदि ! [शूर सेनापति राजन्] (तव) तेरे (रदिते) तोड़ने-फोड़ने पर (क्रोशतु) रोवे ॥७॥
भावार्थभाषाः - शूर सेनापति शत्रुओं को ऐसा मारे कि उनकी स्त्रियाँ अति व्याकुल होकर विलाप करें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(प्रतिघ्नाना) प्रति+हन हिंसागत्योः-शानच्। गमहनजन०। पा० ६।४।९८। उपधालोपः। शिरआद्यङ्गं ताडयन्ती (अश्रुमुखी) वाष्पमुखी (कृधुकर्णी) कृधु ह्रस्वनाम-निघ० २।३। अल्पश्रोत्रा। पटहध्वन्यादिना हतश्रवणसामर्थ्या (च) (क्रोशतु) क्रुश आह्वाने रोदने च। रोदितु (विकेशी) अ० १।२८।४। विकीर्णकेशयुक्ता (पुरुषे) स्वबन्धौ (हते) मारिते सति (रदिते) रद विलेखने-भावे क्त। विदारणे सति (अर्बुदे) म० १। हे शूर सेनापते (तव) ॥
