राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वनस्पतीन्) सेवनीय शास्त्रों के पालन करनेवाले पुरुषों (वानस्पत्यान्) सेवनीय शास्त्रों के पालन करनेवालों के सम्बन्धी पदार्थों (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों, (उत) और (वीरुधः) जड़ी-बूटियों को, (गन्धर्वाप्सरसः) गन्धर्वों [पृथिवी के धारण करनेवालों] और अप्सरों [आकाश में चलनेवालों] (सर्पान्) सर्पों [सर्पों के समान तीव्र दृष्टिवालों] (देवान्) विजय चाहनेवालों, (पुण्यजनान्) पुण्यात्मा (पितॄन्) पितरों [महाविद्वानों] (तान् सर्वान्) इन सब लोगों को (अर्बुदे) हे अर्बुदि [शूर सेनापति राजन्] (त्वम्) तू (अमित्रेभ्यः दृशे) अमित्रों के लिये देखने को (कुरु) कर (च) और [हमें अपने] (उदारान्) बड़े उपायों को (प्र दर्शय) दिखादे ॥२४॥
भावार्थभाषाः - राजा वेदवेत्ताओं, उत्तम अन्न आदि पदार्थों, विश्वकर्मा शिल्पियों और वैज्ञानिक आदि लोगों का संग्रह करके शत्रुओं को अपना वैभव दिखावे ॥२४॥इस मन्त्र का पहिला और दूसरा भाग अ० ८।८।१४। तथा १५ में और तीसरा भाग इस सूक्त के मन्त्र २२ में आया है ॥