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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (न्यर्बुदे) हे न्यर्बुदि ! [निरन्तर पुरुषार्थी प्रजागण] (प्रब्लीनः) घिरा हुआ, (मृदितः) कुचला हुआ (हतः) मारा गया (अमित्रः) वैरी (शयाम्) सो जावे। (अग्निजिह्वाः) अग्नि की जीभें [लपटें] और (धूमशिखाः) धुएँ की चोटियाँ [आग्नेय शस्त्रों से] (सेनया) सेना द्वारा (जयन्तीः) जीतती हुई (यन्तु) चलें ॥१९॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्माओं के सेना दल आग्नेय आदि शस्त्रों को जल, थल और आकाश से इस प्रकार छोड़ें कि शत्रु लोग रुन्ध-खुँद कर मर जावें ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(प्रब्लीनः) व्ली स्वीकरणे वेष्टने गतौ च-क्त, वस्य बः। वेष्टितः। आच्छादितः (मृदितः) संपिष्टगात्रः (शयाम्) लोपस्त आत्मनेपदेषु। पा० ७।१।४१। तलोपः। शेताम् (हतः) नाशितः (अमित्रः) पीडकः शत्रुः (न्यर्बुदे) म० ४। हे निरन्तरपुरुषार्थिन् प्रजागण (अग्निजिह्वाः) आग्नेयशस्त्राणामग्नेर्ज्वालाः (धूमशिखाः) धूमस्य शिखररूपाः समुच्चयाः (जयन्तीः) शत्रुबलं जयन्त्यः (यन्तु) गच्छन्तु (सेनया) ॥
