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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (चतुर्दंष्ट्रान्) चार डाढ़ोंवालों [बड़े हाथियों] और (श्यावदतः) काले दातोंवाले, (कुम्भमुष्कान्) कुम्भसमान [घड़ा समान बड़े] अण्डकोशवाले (असृङ्मुखान्) रुधिरमुखों [सिंह आदि जीवों] को (च) और (ये) जो (स्वभ्यसाः) स्वभाव से भयानक [और जो] (उद्भ्यसाः) ऊपरी [आकार से] भयानक हैं [उनको, कँपा दे म० १८] ॥१७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में (उत् वेपय) [कँपा दे] क्रिया पद-मन्त्र १८ से आता है। राजा भयानक हिंसक जीवों और उनके समान दुष्ट मनुष्यों को राज्य से हटाकर प्रजापालन करें ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(चतुर्दंष्ट्रान्) चतुर्दन्तान् महागजान् (श्यावदतः) श्यामवर्णदन्तयुक्तान् (कुम्भमुष्कान्) कुम्भाकृतिमुष्कयुक्तान् (असृङ्मुखान्) रुधिरमुखान् सिंहादीन् (स्वभ्यसाः) भ्यस भये-घञर्थे क प्रत्ययः। स्वेन आत्मना स्वभावेन भयानकाः (ये) (च) (उद्भ्यसाः) ऊर्ध्वप्रकारेण भयानकाः ॥
