0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) इन [शत्रुओं] की (बाहवः) भुजाएँ (मुह्यन्तु) निकम्मी हो जावें, (च) और (यत्) जो कुछ (हृदि) हृदय में (चित्ताकूतम्) विचार और सङ्कल्प हैं, (एषाम्) इनका (किं चन) वह कुछ भी, (अर्बुदे) हे अर्बुदि [शूर सेनापति राजन्] (तव) तेरे (रदिते) तोड़ने-फोड़ने पर (मा उत् शेषि) न बचा रहे ॥१३॥
भावार्थभाषाः - युद्धविशारद सेनापति की वीरता प्रकट होने पर शत्रुदल और उनके विचार और मनोरथ निष्फल पड़ जावें ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(मुह्यन्तु) मूढा निरर्थका भवन्तु (एषाम्) शत्रूणाम् (बाहवः) (चित्ताकूत्तम्) म० १। विचाराणां सङ्कल्पानां च समाहारः (च) (यत्) (हृदि) हृदये (एषाम्) (मा उच्छेषि) शिष्लृ विशेषणे-कर्मणि लुङ्। अवशिष्टं मा भूत् (किंचन) तत् किमपि। अन्यद् गतम्-म० ७ ॥
