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इन्द्रा॒दिन्द्रः॒ सोमा॒त्सोमो॑ अ॒ग्नेर॒ग्निर॑जायत। त्वष्टा॑ ह जज्ञे॒ त्वष्टु॑र्धा॒तुर्धा॒ताजा॑यत ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रात् । इन्द्र: । सोमात् । सोम: । अग्ने: । अग्नि: । अजायत । त्वष्टा । ह । जज्ञे । त्वष्टु: । धातु: । धाता । अजायत ॥१०.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रात्) इन्द्र [पूर्वकल्पवर्ती मेघ] से (इन्द्रः) इन्द्र [मेघ], (सोमात्) सोम [प्रेरक वायु] से (सोमः) सोम [प्रेरक वायु], (अग्नेः) अग्नि [सूर्य आदि तेज] से (अग्निः) अग्नि [सूर्य आदि तेज] (अजायत) उत्पन्न हुआ है। (त्वष्टा) त्वष्टा [शरीर आदि का कारण पृथिवी तत्त्व] (ह) निश्चय करके (त्वष्टुः) त्वष्टा [शरीर आदि के कारण पृथिवी तत्त्व] से (जज्ञे) प्रकट हुआ है और (धातुः) धाता [धारण करनेवाले आकाश] से (धाता) धाता [धारण करनेवाला आकाश] (अजायत) उत्पन्न हुआ है ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो पदार्थ प्रलय में परमाणुरूप थे, वे पूर्व कल्प के समान इस कल्प में भी ईश्वरसामर्थ्य से उत्पन्न हुए हैं ॥९॥ऋग्वेद १०।१९०।३। में ऐसा वर्णन है−(सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्) सूर्य और चन्द्रमा को धाता [सर्वधारक परमेश्वर] ने पूर्वकल्प के समान रचा है ॥
टिप्पणी: ९−इन्द्रादिशब्दा व्याख्याताः-म० ८ (इन्द्रात्) मेघात् (इन्द्रः) मेघः (सोमात्) वायोः (सोमः) वायुः (अग्नेः) सूर्यादितापात् (अग्निः) (अजायत) (त्वष्टा) शरीरादिकारणं भूमितत्त्वम् (ह) एव (जज्ञे) प्रादुर्बभूव (त्वष्टुः) (धातुः) (धाता) आकाशः (अजायत) ॥