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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतवः) ऋतुएँ (अजाताः) अनुत्पन्न (आसन्) थे, (अथो) और भी (धाता) धाता [धारण करनेवाला आकाश], (बृहस्पतिः) [बड़े पदार्थों का रक्षक वायु], (इन्द्राग्नी) इन्द्र [मेघ] और अग्नि [सूर्य आदि] और (अश्विना) दिन और राति [अनुत्पन्न थे], (तर्हि) तब (ते) उन्होंने [ऋतु आदिकों ने] (कम् ज्येष्ठम्) कौन से सर्वश्रेष्ठ को (उप आसत) पूजा है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जब वसन्त आदि ऋतुएँ और आकाश वायु आदि पदार्थ स्थूल दशा में नहीं थे, तब उनका अधिष्ठाता कौन था। इस प्रश्न का उत्तर अगले मन्त्र में है ॥५॥
टिप्पणी: ५−(अजाताः) अनुत्पन्नाः। अप्रादुर्भूताः (आसन्) अभवन् (ऋतवः) वसन्ताद्याः कालाः (अथो) अपि च (धाता) सर्वस्य विधाता-निरु० ११।१०। इति मध्यस्थानदेवतासु पाठात्। लोकानां धारक आकाशः (बृहस्पतिः) बृहस्पतिर्बृहतः पाता या पालयिता वा-निरु० १०।११। इति मध्यस्थानदेवतासु पाठात्। बृहतां प्राणिनां रक्षको वायुः (इन्द्राग्नी) मेघतापौ (अश्विना) अहोरात्रौ निरु० १२।१। (तर्हि) तदा (कम्) अधिष्ठातारम् (ते) पूर्वोक्ताः (ज्येष्ठम्) सर्वोत्कृष्टम् (उपासत) पूजितवन्तः ॥
