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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्तीमासु) बाफवाले, (वृद्धासु) बढ़े हुए (अप्सु अन्तरा) अन्तरिक्ष के भीतर (शरीरम्) शरीर (हितम्) रक्खा हुआ है। (तस्मिन् अन्तरा) उस [शरीर] के भीतर (शवः) बल [गतिकारक वा वृद्धिकारक जीवात्मा] (अधि) अधिकारपूर्वक है, (तस्मात्) उस [जीवात्मा] से (अधि) ऊपर (शवः) बल [गतिकारक वा वृद्धिकारक परमात्मा] (उच्यते) कहा जाता है ॥३४॥
भावार्थभाषाः - विशाल आकाश के भीतर मेघ, वायु आदि पदार्थ हैं। उस आकाश के भीतर सब शरीर हैं, शरीरों में चेतन्य जीवात्मा अधिष्ठाता है। उस जीवात्मा का भी अधिष्ठाता सर्वनियन्ता परमात्मा है ॥३४॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ३४−(अप्सु) आपः=अन्तरिक्षम्-निघ० १।३। अन्तरिक्षे। आकाशे (स्तीमासु) ष्टीम आर्द्रीभावे-पचाद्यच्। आर्द्रं कुर्वतीषु। वाष्पयुक्तासु (वृद्धासु) वृद्धियुक्तासु (शरीरम्) (अन्तरा) मध्ये (हितम्) धृतम् (तस्मिन्) शरीरे (शवः) अ० ५।२।२। श्वेः सम्प्रसारणं च। उ० ४।१५३। टुओश्वि गतिवृद्ध्योः-असुन्। बलम्-निघ० २।९। गतिकरं वृद्धिकरं वा जीवात्मरूपं बलम् (अधि) उपरि (तस्मात्) जीवात्मनः सकाशात् (शवः) गतिकरं वृद्धिकरं वा परमात्मरूपं बलम् (अधि) उपरि (उच्यते) कथ्यते ॥
