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या आपो॒ याश्च॑ दे॒वता॒ या वि॒राड्ब्रह्म॑णा स॒ह। शरी॑रं॒ ब्रह्म॒ प्रावि॑श॒च्छरी॒रेऽधि॑ प्र॒जाप॑तिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या: । आप: । या: । च । देवता: । या । विऽराट् । ब्रह्मणा । सह । शरीरम् । ब्रह्म । प्र । अविशत् । शरीरे । अधि । प्रजाऽपति: ॥१०.३०॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:30


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (आपः) व्यापक [इन्द्रियों की शक्तियाँ] (च) और (याः) जो (देवताः) दिव्य गुणवाले [इन्द्रियों के गोलक] हैं, और (या) जो (विराट्) विराट् [विविध प्रकार शोभायमान प्रकृति] (ब्रह्मणा सह) ब्रह्म [परमात्मा] के साथ है, [इस सब ने और] (ब्रह्म) अन्न ने (शरीरम्) शरीर में (प्र अविशत्) प्रवेश किया, और (प्रजापतिः) प्रजापति [इन्द्रिय आदि प्रजाओं का स्वामी, जीवात्मा] (शरीरे) शरीर में (अधि) अधिकारपूर्वक [ठहरा] ॥३०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने जीव के शरीर में इन्द्रियों को उनकी शक्तियों सहित प्रकृति द्वारा रचा और शरीरपुष्टि के लिये अन्न आदि पदार्थ देकर सबका अधिष्ठाता जीवात्मा को किया ॥३०॥
टिप्पणी: ३०−(याः) (आपः) आप आपनानि-निरु० १२।३७। व्यापकानीन्द्रियसामर्थ्यानि (याः) (च) (देवताः) दिव्यगुणानीन्द्रियच्छिद्राणि (या) (विराट्) विविधराजमाना प्रकृतिः (ब्रह्मणा) परमात्मना (सह) (शरीरम्) (ब्रह्म) अन्नम्-निघ० २।७। (प्राविशत्) (शरीरे) (अधि) अधिकारपूर्वकम् (प्रजापतिः) इन्द्रियादिप्रजानां पालको जीवात्मा-अतिष्ठत् इति शेषः ॥