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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दश देवाः) दस दिव्य पदार्थ [पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय] (पुरा) पूर्व काल में [वर्तमान] (देवेभ्यः) दिव्य पदार्थों [कर्मफलों] से (साकम्) परस्पर मिले हुए (अजायन्त) उत्पन्न हुए। (यः) जो पुरुष (वै) निश्चय करके (तान्) उनको (प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष (विद्यात्) जान लेवे, (सः) वह (वै) ही (अद्य) आज (महत्) महान् [ब्रह्म] को (वदेत्) बतलावे ॥३॥
भावार्थभाषाः - फिर उस ब्रह्म के सामर्थ्य से प्राणियों के पूर्वसंचित कर्म अनुसार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका और पाँच कर्मेन्द्रिय वाक्, हाथ, पाँव, पायु, उपस्थ, कर्मों के जानने और करने के लिये उत्पन्न हुए। सूक्ष्मदर्शी पुरुष ही इसको जानकर परमात्मा का उपदेश करते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(दश) दशसंख्याकाः (साकम्) सह (अजायन्त) प्रादुरभवन् (देवाः) स्वस्वविषयप्रकाशनशीलानि ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि (देवेभ्यः) पञ्चमी विभक्तिः। दिव्यपदार्थेभ्यः। पूर्वकर्मफलानां सकाशात् (पुरा) पुरातनकाले वर्तमानेभ्यः (यः) विवेकी (वै) (तान्) (विद्यात्) जानीयात् (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारेण (सः) (वै) (अद्य) अस्मिन् दिने (महत्) पूजनीयं ब्रह्म (वदेत्) उपदिशेत् ॥
