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अस्थि॑ कृ॒त्वा स॒मिधं॒ तद॒ष्टापो॑ असादयन्। रेतः॑ कृत्वाज्यं॑ दे॒वाः पुरु॑ष॒मावि॑शन् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अस्थि । कृत्वा । सम्ऽइधम् । तत् । अष्ट । आप: । असादयन् । रेत: । कृत्वा । आज्यम् । देवा: । पुरुषम् । आ । अविशन् ॥१०.२९॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:29


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) व्यापक (देवाः) दिव्य गुणों [ईश्वरनियमों] ने (तत्) फिर (अस्थि) हड्डी को (समिधम्) समिधा [इन्धन समान पाकसाधन] (कृत्वा) बनाकर और (रेतः) वीर्य [वा स्त्रीरज] को (आज्यम्) घृत [घृत समान पुष्टिकारक] (कृत्वा) बनाकर (अष्ट) आठ प्रकार से [रस अर्थात् खाये अन्न का सार, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, वीर्य, वा स्त्रीरज इन सात धातुओं और मन के द्वारा] (पुरुषम्) पुरुष [प्राणी के शरीर] को (असादयन्) चलाया, और [उस में] (आ अविशन्) उन्होंने प्रवेश किया ॥२९॥
भावार्थभाषाः - सर्वव्यापक परमेश्वर ने अपनी शक्ति के प्रवेश से प्रधानता से हड्डियों को काष्ठ रूप अन्न आदि के पाक का साधन और पुरुष के वीर्य वा स्त्री के रज को घृत समान पुष्टिकारक बनाकर रस, रक्त, मांस आदि सात धातुओं और मन के द्वारा प्राणियों के शरीर को कार्ययोग्य किया है ॥२९॥
टिप्पणी: २९−(अस्थि) (कृत्वा) निर्माय (समिधम्) समिन्धनसाधनं शरीरपरिपाकस्य निमित्तम् (तत्) तदा (अष्ट) अष्टधा। रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः-इत्येते सप्तधातवो मनश्चेत्येभिः (आपः) आपः=आपनाः-निरु० १२।३७। व्यापकाः (असादयन्) म० २८। प्रेरितवन्तः (रेतः) वीर्यं स्त्रीरजो वा (कृत्वा) (आज्यम्) घृतवत्पुष्टिकरम् (देवाः) दिव्याः परमेश्वरगुणाः (पुरुषम्) प्राणिशरीरम् (आ अविशन्) प्रविष्टवन्तः ॥