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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणापानौ) प्राण और अपान [भीतर और बाहिर जानेवाला श्वास], (चक्षुः) नेत्र, (श्रोत्रम्) कान, (च) और (या) जो (अक्षितिः) [सुख की] निर्हानि (च) और (क्षितिः) [दुःख की] हानि। (व्यानोदानौ) व्यान [सब नाड़ियों में रस पहुँचानेवाला वायु] और उदान [ऊपर को चढ़नेवाला वायु], (वाक्) वाणी और (मनः) मन, (ते) ये सब (शरीरेण) शरीर के साथ (ईयन्ते) चलते हैं ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जीवों में प्राण अपान आदि सब व्यापार शरीर के साथ होते हैं ॥२६॥इस मन्त्र के पहिले तीन पाद ऊपर मन्त्र ४ में आ चुके हैं ॥
टिप्पणी: २६−त्रयः पादाः पूर्ववत्-म० ४। (शरीरेण) देहेन (ते) पूर्वोक्ताः पदार्थाः (ईयन्ते) ईङ् गतौ−श्यन्। गच्छन्ति। प्रवर्तन्ते ॥
