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आ॑न॒न्दा मोदाः॑ प्र॒मुदो॑ऽभिमोद॒मुद॑श्च॒ ये। ह॒सो न॑रिष्टा नृ॒त्तानि॒ शरी॑र॒मनु॒ प्रावि॑शन् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आऽनन्दा: । मोदा: । प्रऽमुद: । अभिमोदऽमुद: । च । ये । हस: । नरिष्टा । नृत्तानि । शरीरम् । अनु । प्र । अविशन् ॥१०.२४॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:24


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आनन्दाः) आनन्द, (मोदाः) हर्ष (प्रमुदः) बड़े आनन्द (च) और (ये) (अभिमोदमुदः) बड़े उत्सवों से हर्ष देनेवाले पदार्थ हैं [वे सब और]। (हसः) हंसी, (नृत्तानि) नाचों और (नरिष्टा) मङ्गल कामों [खेल-कूद आदि] [इन सब ने] (शरीरम्) शरीर में (अनु) धीरे-धीरे (प्र अविशन्) प्रवेश किया ॥२४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शरीर द्वारा अनेक शुभ कर्म करके अनेक मङ्गल मनावें ॥२४॥इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध आ चुका है-अ० ११।७।२६ ॥
टिप्पणी: २४−पूर्वार्धर्चो व्याख्यातः-अ० ११।७।२६। (हसः) स्वनहसोर्वा। पा० ३।३।६२। हसे हसने-अप्। हासः (नरिष्टा) न+रिष हिंसायाम्-कर्तरि-क्त। शेर्लोपः। अरिष्टानि। अहिंसकानि। मङ्गलकर्माणि (नृत्तानि) नृती गात्रविक्षेपे-क्त। तालमानयुक्तान्यङ्गविक्षेपरूपाणि नर्तनानि। अन्यत् पूर्ववत्-म० २२ ॥