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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तपः) तप [ईश्वर का सामर्थ्य] (च च) और (कर्म) कर्म [प्राणियों के कर्म का फल] (एव) ही (महति अर्णवे अन्तः) बड़े समुद्र [परमेश्वर के गम्भीर सामर्थ्य] के भीतर (आस्ताम्) दोनों थे। [तप और कर्म ही] (ते) वे प्रसिद्ध (जन्याः) उत्पत्ति में साधन [योग्य] पदार्थ और (ते) वे ही (वराः) वर [वरणीय इष्टफल] (आसन्) थे, (ब्रह्म) ब्रह्म [सबसे बड़ा परमात्मा] (ज्येष्ठवरः) सर्वोत्तम वरों [इष्ट फलों] का दाता (अभवत्) हुआ ॥२॥
भावार्थभाषाः - अनादि चक्र रूप संसार में परमात्मा अपने सामर्थ्य से प्राणियों के कर्मानुसार सृष्टि रचकर आप ही सर्वनियन्ता हुआ। यह गत मन्त्र के तीनों प्रश्नों का उत्तर है। मन्त्र ३ तथा ४ में इसी का विवरण है ॥२॥
टिप्पणी: २−(तपः) तप ऐश्वर्ये-असुन्। ईश्वरसामर्थ्यम् (च) (एव) (आस्ताम्) अभवताम् (कर्म) प्राणिनां पुण्यपापकर्मफलम् (च) (अन्तः) मध्ये (महति) प्रभूते (अर्णवे) अ० १।१०।४। समुद्रे। परमेश्वरस्य गम्भीरसामर्थ्ये (ते) प्रसिद्धाः (ब्रह्म) प्रवृद्धः परमात्मा। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥
