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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सर्वे) सब (देवाः) दिव्य पदार्थों [तत्त्वों के गुणों] ने (उप) उपकारीपन से (अशिक्षन्) समर्थ [सहायक] होना चाहा, (तत्) उस [कर्म] को (सती) सत्यव्रता (वधूः) चलानेवाली [परमेश्वर शक्ति] (अजानात्) जानती थी। (वशस्य) वश करनेवाले [परमेश्वर] की (या) जो (ईशा) ईश्वरी (जाया) उत्पन्न करनेवाली शक्ति है, (सा) उसने (अस्मिन्) इस [शरीर] में (वर्णम्) रङ्ग (आ) सब ओर से (अभरत्) भर दिया ॥१७॥
भावार्थभाषाः - तत्त्वों के संयोग-वियोग क्रिया जाननेवाले महारासायनिक, सर्वनियन्ता, सत्यव्रती, परमेश्वर ने अपनी शक्ति से व्यक्ति-व्यक्ति को विशेष करके जानने के लिये शरीर पर गोरा, काला, पीला आदि रंग चढ़ा दिया ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(सर्वे) (देवाः) दिव्यपदार्थाः। तत्त्वगुणाः (उप) उपकारकत्वेन (अशिक्षन्) शक्लृ शक्तौ-सन्, लङ्। शक्ताः सहायका भवितुमैच्छन् (तत्) वर्णकर्म (अजानात्) ज्ञातवती (वधूः) वहेर्धश्च। उ० १।८३। वह प्रापणे-ऊ, हस्य धः। वहनशक्तिः परमेश्वरः (सती) सत्यव्रता (ईशा) ईश ऐश्वर्ये क, टाप्। ईश्वरी नियन्त्री (वशस्य) वश कान्तौ-कर्तरि अच्। वशयितुः परमेश्वरस्य (या) (जाया) म० १। उत्पादनशक्तिः (सा) नियन्त्री शक्तिः ॥
