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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये ते) वे जो (दश देवाः) दस दिव्य गुण [दस इन्द्रियों के विषयग्राहक गुण] (पुरा) पूर्वकाल में [वर्तमान] (देवेभ्यः) दिव्य पदार्थों [कर्मफलों] से (जाताः) उत्पन्न हुए (आसन्) थे, (ते) वे (पुत्रेभ्यः) पुत्रों [पुत्ररूप इन्द्रियों के गोलकों] को (लोकम्) स्थान [दर्शन वा विषयग्रहण सामर्थ्य] (दत्त्वा) देकर (कस्मिन् लोके) कौन से स्थान में (आसते) बैठते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - पूर्व कल्प के अनुसार आँख, कान आदि अपने-अपने गोलकों में दर्शन, श्रवण आदि गुणों के प्रवेश करने से विषयों का ग्रहणसामर्थ्य होता है। फिर वे दर्शन आदि गुण कहाँ रहते हैं। इसका उत्तर अन्य प्रश्नों के साथ आगे मन्त्र १३ में है ॥१०॥इस मन्त्र का मिलान-मन्त्र ३ से करो ॥
टिप्पणी: १०−(ये) (ते) (आसन्) अभवन् (दश) दशसंख्याकाः (जाताः) प्रादुर्भूताः (देवाः) म० ३। ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां विषयग्राहकगुणाः (देवेभ्यः) दिव्यपदार्थानां कर्मफलानां सकाशात् (पुरा) पूर्वकल्पे वर्तमानेभ्यः (पुत्रेभ्यः) पुत्ररूपेभ्य इन्द्रियगोलकेभ्यः (लोकम्) स्थानम्। दर्शनस्य विषयस्य वा ग्रहणसामर्थ्यम् (दत्त्वा) (कस्मिन्) (लोके) स्थाने (आसते) उपविशन्ति ॥
