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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (पार्थिवाः) पृथिवी के, (दिव्याः) आकाश के (पशवः) प्राणी (उत) और (आरण्याः) जंगल के (मृगाः) जन्तु हैं [उनको] और (शकुन्तान्) शक्तिवाले (पक्षिणः) पक्षियों को (ब्रूमः) हम पुकारते हैं, (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रयत्न करें कि पृथिवी, जङ्गल और आकाश के सब प्राणी सुखदायक होवें ॥८॥इस मन्त्र का मिलान-अथर्व० ११।५।२१। से करो ॥
टिप्पणी: ८−(पार्थिवाः) पृथिवीभवाः (दिव्याः) आकाशे भवाः (पशवः) प्राणिनः (आरण्याः) जङ्गलभवाः (उत) (ये) (मृगाः) जन्तवः (शकुन्तान्) शकेरुनोन्तोन्त्युनयः। उ० ३।४९। शक्लृ शक्तौ-उन्त प्रत्ययः। शक्तियुक्तान् (पक्षिणः) वयांसि। अन्यद् गतम्-म० १ ॥
