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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अहोरात्रे) दिन और राति (अथो) और (उषाः) उषा [प्रभात वेला] (मा) मुझे (शपथ्यात्) शपथ में होनेवाले दोष से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें। (देवः) उत्तम गुणवाला (सोमः) ऐश्वर्यवान्, (यम्) जिसको,(चन्द्रमाः इति) यह चन्द्रमा है−(आहुः) कहते हैं, (मा) मुझे (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दिन-राति और प्रातः-सायं चन्द्रमा के समान शान्तस्वभाव होकर सत्य शपथ आदि वचन करके आनन्द भोगें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(मुञ्चन्तु) मोचयन्तु (मा) माम् (शपथ्यात्) शपथे सत्यताकरणाय दिव्यभेदे भवाद् दोषात् (अहोरात्रे) (उषाः) प्रभातवेला (सोमः) ऐश्वर्यवान् (मा) माम् (देवः) उत्तमगुणयुक्तः (मुञ्चन्तु) वियोजयतु (यम्) (आहुः) कथयन्ति (चन्द्रमाः) चन्द्रलोकः (इति) वाक्यसमाप्तौ ॥
