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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गन्धर्वाप्सरसः) गन्धर्वों [पृथिवी के धारण करनेवालों और अप्सरों आकाश में चलनेवाले पुरुषों] को और (अश्विना) कामों में व्यापक रहनेवाले दोनों [माता-पिता के समान हितकारी] (ब्रह्मणः पतिम्) वेद के रक्षक [आचार्य आदि] को (ब्रूमः) हम पुकारते हैं। (यः) जो (अर्यमा) न्यायकारी (नाम) प्रसिद्ध (देवः) विजयी पुरुष है [उसको भी], (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥४॥
भावार्थभाषाः - हम विविध विद्यानिपुण पुरुषों से सहाय लेकर परस्पर रक्षा करें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(गन्धर्वाप्सरसः) अ० ८।८।१५। गां पृथिवीं धरन्ति ये ते गन्धर्वाः। अप्सु आकाशे सरन्ति ते अप्सरसः। तान् पुरुषान् (ब्रूमः) (अश्विना) अ० २।२९।६। कार्येषु व्याप्तिमन्तौ जननीजनकौ यथा तथा हितकारिणम् (ब्रह्मणस्पतिम्) वेदस्य रक्षकमाचार्यम् (अर्यमा) अ० ३।१४।२। अरीणां नियामकः। न्यायकारी पुरुषः (नाम) प्रसिद्धौ (यः) (देवः) विजयी। अन्यद् गतम्-म० १ ॥
