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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मातली) इन्द्र [जीव] का रथवान् [मन] (रथक्रीतम्) रथ [शरीर] द्वारा पाये हुए (यत्) जिस (भेषजम्) भयनिवारक (अमृतम्) अमृत [अमरपन, मोक्षसुख] को (वेद) जानता है, (तत्) उस [अमृत] को (इन्द्रः) इन्द्र [परमेश्वर] ने (अप्सु) सब प्रजाओं में (प्र अवेशयत्) प्रवेश किया है, (आपः) हे प्रजाओ ! (तत्) उस (भेषजम्) भयनिवारक वस्तु [मोक्षसुख] का (दत्त) दान करो ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जो मोक्षसुख शरीर द्वारा प्राप्त होकर मन से अनुभव किया जाता है, वह मोक्ष सुख ईश्वरनियम से सब प्राणियों को प्राप्य है। उसके पाने का प्रत्येक मनुष्य प्रयत्न करे ॥२३॥इस मन्त्र का मिलान अथर्व० ८।९।५। से करो। इति तृतीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २३−(यत्) (मातली) अ० ८।९।५। मतल-इञ्, विभक्तेः पूर्वसवर्णदीर्घः। मातलिः। इन्द्रस्य जीवस्य सारथिः। मनः (रथक्रीतम्) रथेन शरीरेण प्राप्तम् (अमृतम्) मोक्षसुखम् (वेद) जानाति (भेषजम्) भयनिवारकम् (तत्) अमृतम् (इन्द्रः) परमेश्वरः (अप्सु) आपः (आप्ताः) प्रजाः-दयानन्दभाष्ये यजु० ६।२७। प्रजासु। प्राणिषु (प्रावेशयत्) प्रविष्टवान् (तत्) (आपः) हे प्रजाः (दत्त) प्रयच्छत (भेषजम्) भयनिवारकं वस्तु। मोक्षसुखम् ॥
