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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भूतम्) ऐश्वर्यवान्, विचारशील [योगीन्द्र] का, (भूतपतिम्) प्राणियों के पालनकर्ता का, (उत) और (भूतानाम्) तत्त्वों [पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश द्रव्यों] को (यः) जो (वशी) वश करनेवाला पुरुष है [उसका] (ब्रूमः) हम कथन करते हैं। (सर्वा) सब (भूतानि) प्राणियों से (संगत्य) मिलकर (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥२१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य जितेन्द्रिय, सर्वहितैषी, तत्त्ववेत्ता जनों से गुण ग्रहण कर के क्लेश का नाश करें ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(भूतम्) भू सत्तायाम्, शुद्धिचिन्तनयोः, मिश्रणे, प्राप्तौ च-कर्मणि कर्तरि वा-क्त, भूत-अर्शआद्यच्। भूतं विभूतिरैश्वर्यं यस्य तम्। तत्त्वचिन्तनशीलम्। योगीन्द्रम्। शिवम् (भूतपतिम्) प्राणिनां पालकम् (भूतानाम्) पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशद्रव्याणाम् (उत) अपि च (यः) (वशी) वशयिता नियन्ता (भूतानि) प्राणिनः। जीवान् (सर्वा) सर्वाणि (संगत्य) मिलित्वा। अन्यत् पूर्ववत् ॥
