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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञम्) यज्ञ [सङ्गतिकरण आदि व्यवहार], (यजमानम्) यजमान [सङ्गतिकरण आदि व्यवहार करनेवाले], (ऋचः) ऋचाओं [स्तुतिविद्याओं] और (भेषजा) भयनिवारक (सामानि) मोक्षज्ञानों का (ब्रूमः) हम कथन करते हैं, (यजूंषि) सत्कर्मों के ज्ञानों और (होत्राः) [दान करने और ग्रहण करने योग्य] वेदविद्याओं का (ब्रूमः) हम कथन करते हैं, (ते) वे [पदार्थ] (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है यज्ञ, यज्ञकर्त्ता और पदार्थों के गुण और मोक्षविद्याओं आदि के तत्त्वज्ञान से आनन्द प्राप्त करें ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(यज्ञम्) सङ्गतिकरणादिव्यवहारम् (यजमानम्) सङ्गतिकरणादिव्यवहारसाधकम् (ऋचः) अ० ६।२८।१। स्तुतिविद्याः (सामानि) अ० ७।५४।१। षो अन्तकर्मणि-मनिन्। मोक्षज्ञाननि (भेषजा) भयनिवारकानि (यजूंषि) अ० ७।५४।२। सत्कर्मज्ञानानि (होत्राः) हुयामाश्रुभसिभ्यस्त्रन्। उ० ४।१६८। हु दानादानयोः−त्रन्, टाप्। दानादानयोग्या वेदवाचः। होत्रा वाङ्नाम-निघ० १।११। (ते) पूर्वोक्ताः पदार्थाः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥
