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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (देवाः) दिव्य गुण (दिविषदः) सूर्य में वर्तमान (च) और (ये) जो (अन्तरिक्षसदः) अन्तरिक्ष में व्याप्त हैं और (ये) जो (शक्राः) शक्तिवाले गुण (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (श्रिताः) स्थित हैं, (ते) (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सूर्य आदि के गुणों को साक्षात् करके सुख प्राप्त करें ॥१२॥इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध-अथर्व० १०।९।१२। में आ चुका है ॥
टिप्पणी: १२−(ये) (देवाः) दिव्यगुणाः (दिविषदः) सूर्ये स्थिताः (अन्तरिक्षसदः) अन्तरिक्षे वर्तमानाः (च) (ये) (पृथिव्याम्) भूमौ (शक्राः) अ० २।५।४। शक्तिमन्तः (ये) (श्रिताः) स्थिताः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥
