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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कष्ट हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निम्) अग्नि, (वनस्पतीन्) वनस्पतियों [बड़े वक्षों] (ओषधीः) ओषधियों [अन्न आदिकों], (उत) और (वीरुधः) [विविध प्रकार उगनेवाली] जड़ी-बूटियों, (इन्द्रम्) इन्द्र [मेघ] और (बृहस्पतिम्) बड़े-बड़े लोकों के पालन करनेवाले (सूर्यम्) सूर्य का (ब्रूमः) हम कथन करते हैं, (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों को योग्य है कि अग्नि आदि पदार्थों के गुण जानकर, उनसे यथावत् उपकार लेकर दुःखों का नाश करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(अग्निम्) (ब्रूमः) कथयामः। स्तुमः (वनस्पतीन्) पिप्पलादिमहावृक्षान् (ओषधीः) अन्नादिरूपाः (उत) अपि च (वीरुधः) विरोहणशीला लताद्याः (इन्द्रम्) मेघम् (बृहस्पतिम्) बृहतां लोकानां पालकम् (सूर्यम्) आदित्यम् (ते) पूर्वोक्ताः (नः) अस्मान् (मुञ्चन्तु) मोचयन्तु, (अंहसः) अमेर्हुक् च। उ० ४।२१३। अम रोगे पीडने च-असुन् हुक् च। कष्टा ॥
