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इ॒मां भूमिं॑ पृथि॒वीं ब्र॑ह्मचा॒री भि॒क्षामा ज॑भार प्रथ॒मो दिवं॑ च। ते कृ॒त्वा स॒मिधा॒वुपा॑स्ते॒ तयो॒रार्पि॑ता॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इमाम् । भूमिम् । पृथिवीम् । ब्रह्मऽचारी । भिक्षाम् । आ । जभार । प्रथम: । दिवम् । च । ते इति । कृत्वा । सम्ऽइधौ । उप । आस्ते । तयो: । आर्पिता । भुवनानि । विश्वा ॥७.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इमाम्) इस (पृथिवीम्) चौड़ी (भूमिम्) भूमि (च) और (दिवम्) सूर्य को (प्रथमः) पहिले [प्रधान] (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी ने (भिक्षाम्) भिक्षा (आ जभार) लिया था। (ते) उन दोनों को (समिधौ) दो समिधा [के समान] (कृत्वा) बनाकर (उप आस्ते) [ईश्वर की] उपासना करता है, (तयोः) उन दोनों में (विश्वा) सब (भुवनानि) भुवन (आर्पिता) स्थापित हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - महाविद्वान् पुरुष पृथिवी और सूर्य आदि के तत्त्वों को जानकर और उपयोगी बनाकर, होमीय अग्नि में दो काष्ठ छोड़कर उन [भूमि और सूर्य] को लक्ष्य में रखता है कि वह इस प्रकार सब संसार का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(इमाम्) दृश्यमानाम् (भूमिम्) (पृथिवीम्) प्रथिताम्। विस्तृताम् (ब्रह्मचारी) म० १ (भिक्षाम्) याच्ञाम् (आ जभार) आजहार। समन्ताद् गृहीतवान् (प्रथमः) प्रधानः (दिवम्) सूर्यम् (च) (ते) द्यावापृथिव्यौ (कृत्वा) विधाय (समिधौ) समिद्रूपे (उपास्ते) परमात्मानं परिचरति (तयोः) द्यावापृथिव्योर्मध्ये (आर्पिता) समन्तात् स्थापितानि (भुवनानि) लोकाः (विश्वा) सर्वाणि ॥