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आ॑चा॒र्यस्ततक्ष॒ नभ॑सी उ॒भे इ॒मे उ॒र्वी ग॑म्भी॒रे पृ॑थि॒वीं दिवं॑ च। ते र॑क्षति॒ तप॑सा ब्रह्मचा॒री तस्मि॑न्दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आऽचार्य: । ततक्ष । नभसी इति । उभे इति । इमे इति । उर्वी इति । गम्भीरे इति । पृथिवीम् । दिवम् । च । ते इति । रक्षति । तपसा । ब्रह्मऽचारी । तस्मिन् । देवा: । सम्ऽमनस: । भवन्ति ॥७.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आचार्यः) आचार्य [साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ानेवाले] ने (उभे) दोनों (इमे) इन (नभसी) परस्पर बँधी हुई, (उर्वी) चौड़ी, (गम्भीरे) गहरी (पृथिवीम्) पृथिवी (च) और (दिवम्) सूर्य को (ततक्ष) सूक्ष्म बनाया है [उपयोगी किया है]। (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी (तपसा) तप से (ते) उन दोनों की (रक्षति) रक्षा करता है, (तस्मिन्) उस [ब्रह्मचारी] में (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (संमनसः) एकमन (भवन्ति) होते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - आचार्य और ब्रह्मचारी श्रवण, मनन और निदिध्यासन से विद्या प्राप्त करके संसार के पृथिवी सूर्य आदि सब पदार्थों का तत्त्व जानकर उन्हें उपयोगी बनाते हैं ॥८॥इस मन्त्र का चौथा पाद प्रथम मन्त्र के दूसरे पाद में आ चुका है ॥
टिप्पणी: ८−(आचार्यः) म० १। साङ्गोपाङ्गवेदाध्यापकः (ततक्ष) तक्षू तनूकरणे-लिट्। सूक्ष्मीकृतवान् (नभसी) अ० ५।१८।५। णह बन्धने-असुन्, हस्य भः। परस्परबद्धे (उभे) (इमे) (उर्वी) विस्तीर्णे (गम्भीरे) अतलस्पर्शे (पृथिवीम्) भूमिम् (दिवम्) सूर्यम् (च) (ते) द्यावापृथिव्यौ (रक्षति) पालयति (तपसा) स्वब्रह्मचर्यनियमेन (ब्रह्मचारी) म० १। व्रती। अन्यद् व्याख्यातम् म० १ ॥