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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्मचारी !] (अस्मासु) हम लोगों में (चक्षुः) नेत्र, (श्रोत्रम्) कान, (यशः) यश, (अन्नम्) अन्न, (रेतः) वीर्य, (लोहितम्) रुधिर और (उदरम्) उदर [की स्वस्थता] (धेहि) धारण कर ॥२५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि वेदवेत्ता विवेकी विद्वान् से नेत्रादि की स्वस्थता की शिक्षा प्राप्त करके आत्मा की शुद्धि से यशस्वी बलवान् होवें ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(चक्षुः) रूपग्राहकमिन्द्रियम् (श्रोत्रम्) शब्दग्राहकमिन्द्रियम् (यशः) कीर्तिम् (अस्मासु) (धेहि) धारय (अन्नम्) भोजनम् (रेतः) वीर्यम् (लोहितम्) रुधिरस्वास्थ्यम् (उदरम्) जठरस्वास्थ्यम् ॥
