ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भ्राजत्) प्रकाशमान (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी [वेदपाठक और वीर्यनिग्राहक पुरुष] (ब्रह्म) वेदज्ञान को (बिभर्ति) धारण करता है, (तस्मिन्) उस [ब्रह्मचारी] में (विश्वे देवाः) सब उत्तम गुण (अधि) यथावत् (समोताः) ओत-प्रोत होते हैं। वह [ब्रह्मचारी] (प्राणापानौ) प्राण और अपान [श्वास-प्रश्वास विद्या] को, (आत्) और (व्यानम्) व्यान [सर्वशरीरव्यापक वायुविद्या] को, (वाचम्) वाणी [भाषणविद्या] को, (मनः) मन [मननविद्या] को, (हृदयम्) हृदय [के ज्ञान] को, (ब्रह्म) ब्रह्म [परमेश्वरज्ञान] को और (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को (जनयन्) प्रकट करता हुआ [वर्तमान होता है] ॥२४॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी वेदों के शब्द, अर्थ और सम्बन्ध जानकर और सम्पूर्ण उत्तम गुणों से सम्पन्न होकर अनेक विद्याओं का प्रकाश करता और बुद्धि का चमत्कार दिखाता है ॥२४॥यह मन्त्र महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि वेदारम्भप्रकरण में व्याख्यात है ॥