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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पार्थिवाः) पृथिवी के और (दिव्याः) आकाश के पदार्थ और (ये) जो (आरण्याः) वन के (च) और (ग्राम्याः) गाँव के (पशवः) पशु हैं। (अपक्षाः) विना पंखवाले (च) और (ये) जो (पक्षिणः) पंखवाले जीव हैं, (ते) वे (ब्रह्मचारिणः) ब्रह्मचारी से (जाताः) प्रसिद्ध [होते हैं] ॥२१॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी ही पृथिवी आदि के पदार्थों और जीवों के गुणों को प्रकाशित करता है ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(पार्थिवाः) पृथिवीभवाः पदार्थाः (दिव्याः) आकाशभवाः (पशवः) गवाश्वसिंहादयः (आरण्याः) वने भवाः (ग्राम्याः) ग्रामे भवाः (अपक्षाः) पक्षरहिताः प्राणिनः (पक्षिणः) पक्षवन्तः (च)। अन्यत् पूर्ववत् म० २० ॥
