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ब्र॑ह्म॒चर्ये॑ण क॒न्या॒ युवा॑नं विन्दते॒ पति॑म्। अ॑न॒ड्वान्ब्र॑ह्म॒चर्ये॒णाश्वो॑ घा॒सं जि॑गीर्षति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ब्रह्मऽचर्येण । कन्या । युवानम् । विन्दते । पतिम् । अनड्वान् । ब्रह्मऽचर्येण । अश्व: । घासम् । जिगीर्षति ॥७.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य [वेदाध्ययन और इन्द्रियनिग्रह] से (कन्या) कन्या [कामनायोग्य पुत्री] (युवानम्) युवा [ब्रह्मचर्य से बलवान्] (पतिम्) पति [पालनकर्ता वा ऐश्वर्यवान् भर्ता] को (विन्दते) पाती है। (अनड्वान्) [रथ ले चलनेवाला] बैल और (अश्वः) घोड़ा (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य के साथ [नियम से ऊर्ध्वरेता होकर] (घासम्=घासेन) घास से (जिगीर्षति) सींचना [गर्भाधान करना] चाहता है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - कन्या ब्रह्मचर्य से पूर्ण विदुषी और युवती होकर पूर्ण ब्रह्मचारी विद्वान् युवा पुरुष से विवाह करे, और जैसे बैल घोड़े आदि बलवान् और शीघ्रगामी पशु घास-तिनके खाकर ब्रह्मचर्यनियम से समय पर बलवान् सन्तान उत्पन्न करते हैं, वैसे ही मनुष्य पूर्ण ब्रह्मचारी, विद्वान् युवा होकर अपने सदृश कन्या से विवाह करके नियमपूर्वक बलवान्, सुशील सन्तान उत्पन्न करें ॥१८॥वैदिक यन्त्रालय अजमेर, और गवर्नमेंट बुक डिपो बम्बई के पुस्तकों में (जिगीर्षति) पद है, जिसका अर्थ [सींचना चाहता है] है, और सेवकलाल कृष्णदासवाले पुस्तक और महर्षि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में (जिगीषति) है, जिसका अर्थ [जीतना चाहता है] है ॥
टिप्पणी: १८−(ब्रह्मचर्येण) म० १७। आत्मनिग्रहवेदाध्ययनादिना (कन्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। कन प्रीतिद्युतिगतिषु-यक्, टाप्। कन्या कमनीया भवति क्वेयं नेतव्येति वा कमनेनानीयत इति वा कनतेर्वा स्यात्कान्तिकर्मणः-निरु० ४।१५। कमनीया। पुत्री (युवानम्) अ० ६।१।२। प्राप्तयुवावस्थाकम्। बलवन्तम् (विन्दते) लभते (पतिम्) पातेर्डतिः। उ० ४।५७। पा रक्षणे-डति। यद्वा, सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। पत ऐश्वर्ये-इन्। पालकम्। ऐश्वर्यवन्तम्। भर्तारम् (अनड्वान्) अ० ४।११।१। अनस्+वह प्रापणे-क्विप्, अनसो डश्च। रथवाहको वृषभः (ब्रह्मचर्येण) (अश्वः) शीघ्रगामी घोटकः (घासम्) घस भक्षणे-घञ्। तृतीयार्थे द्वितीया। घासेन। गवां भक्ष्यतृणभेदेन (जिगीर्षति) गृ सेचने-सन्। गर्तुं सेक्तुं निषेक्तुं गर्भाधानं कर्तुमिच्छति। जिगीषतीति वक्षे, जि जये-सन्। जेतुमिच्छति ॥