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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मचर्येण) वेदविचार और जितेन्द्रियतारूपी (तपसा) तप से (राजा) राजा (राष्ट्रम्) राज्य को (वि) विशेष करके (रक्षति) पालता है। (आचार्यः) आचार्य [अङ्गों, उपाङ्गों और रहस्य सहित वेदों का अध्यापक] (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य [वेदविद्या और इन्द्रियदमन] से (ब्रह्मचारिणम्) ब्रह्मचारी [वेद विचारनेवाले जितेन्द्रिय पुरुष] को (इच्छते) चाहता है ॥१७॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचर्यरूप तपस्या धारण करनेवाला राजा प्रजापालन में निपुण होता है और ब्रह्मचर्य के कारण आचार्य, विद्यावृद्धि के लिये ब्रह्मचारी से प्रीति करता है ॥१७॥मन्त्र १७, १८, १९ स्वामी दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वर्णाश्रमविषय पृष्ठ २३७ और मन्त्र १७, १८ संस्कारविधि वेदारम्भ प्रकरण में व्याख्यात हैं ॥
टिप्पणी: १७−(ब्रह्मचर्येण) अ० ७।१०९।७। ब्रह्म+चर गतौ-यत्। आत्मनिग्रहवेदाध्ययनादिना (तपसा) तपश्चरणेन (राजा) (राष्ट्रम्) राज्यम् (वि) विशेषेण (रक्षति) पालयति (आचार्यः) (ब्रह्मचर्येण) (ब्रह्मचारिणम्) वेदाध्ययनशीलं शिष्यम् (इच्छते) अभिलष्यति ॥
