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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आचार्यः) आचार्य (मृत्युः) मृत्यु [रूप] (वरुणः) जल [रूप], (सोमः) चन्द्र [ओषधयः] ओषधें [अन्न आदि रूप] और (पयः) दूध [रूप] हुआ है। (जीमूताः) अनावृष्टि जीतनेवाले, मेघ [उसके लिये] (सत्वानः) गतिशील वीर [रूप] (आसन्) हुए हैं, (तैः) उन के द्वारा (इदम्) यह (स्वः) मोक्षसुख (आभृतम्) लाया गया है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - आचार्य, साङ्गोपाङ्ग और सरहस्य वेदों का पढ़ानेवाला पुरुष, दोषों के नाश करने को मृत्युरूप और सद्गुणों के बढ़ाने को जल, चन्द्र आदि रूप होकर संसार में मेघों के समान सुख बढ़ाता है ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(आचार्यः) म० १। साङ्गोपाङ्गरहस्यवेदाध्यापकः (मृत्युः) मृत्युरूपः (वरुणः) जलरूपः (सोमः) चन्द्ररूपः (पयः) दुग्धरूपः (जीमूताः) जेर्मूट् चोदात्तः। उ० ३।९१। जि जये-क्त, मूडागमो धातोर्दीर्घश्च। जयन्त्यनावृष्टिं ये। मेघाः (आसन्) (सत्वानः) अ० ५।२०।८। षद्लृ गतौ-क्वनिप्। गतिशीलाः। वीररूपाः (तैः) मेघैः (इदम्) उपस्थितम् (स्वः) सुखम् (आहृतम्) आहृतम्। प्राप्तम् ॥
