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अ॒ग्नौ सूर्ये॑ च॒न्द्रम॑सि मात॒रिश्व॑न्ब्रह्मचा॒र्यप्सु स॒मिध॒मा द॑धाति। तासा॑म॒र्चींषि॒ पृथ॑ग॒भ्रे च॑रन्ति॒ तासा॒माज्यं॒ पुरु॑षो व॒र्षमापः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्नौ । सूर्ये । चन्द्रमसि । मातरिश्वन् । ब्रह्मऽचारी । अप्सुऽसु । सम्ऽइधम् । आ । दधाति । तासाम् । अर्चीषि । पृथक् । अभ्रे । चरन्ति । तासाम् । आज्यम् । पुरुष: । वर्षम् । आप: ॥७.१३॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:13


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी (अग्नौ) अग्नि में, (सूर्ये) सूर्य में, (चन्द्रमसि) चन्द्रमा में, (मातरिश्वन्) आकाश में चलनेवाले पवन में और (अप्सु) जलधाराओं में (समिधम्) समिधा [प्रकाशसाधन] को (आ दधाति) सब प्रकार से धरता है। (तासाम्) उन [जलधाराओं] की (अर्चींषि) ज्वालाएँ (पृथक्) नाना प्रकार से (अभ्रे) मेघ में (चरन्ति) चलती हैं, (तासाम्) उन [जलधाराओं] का (आज्यम्) घृत [सार पदार्थ] (पुरुषः) पुरुष, (वर्षम्) वृष्टि और (आपः) सब प्रजाएँ हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी अपने विद्याबल से अग्नि, सूर्य आदि के तत्त्वों को जान लेता है और उस जल का भी ज्ञान प्राप्त करता है, जो बिजुली के संसर्ग से वृष्टि होकर मनुष्य, जल, और सब प्राणी आदि की सृष्टि का कारण होता है ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(अग्नौ) पार्थिवतापे (सूर्ये) आदित्ये (चन्द्रमसि) चन्द्रलोके (मातरिश्वन्) अ० ५।१०।८। विभक्तेर्लुक्। मातरि मानकर्तरि आकाशे गमनशीले वायौ (ब्रह्मचारी) म० १ (अप्सु) जलधारासु (समिधम्) प्रकाशसाधनम् (आ दधाति) सम्यग् धरति (तासाम्) अपाम् (अर्चींषि) तेजांसि (पृथक्) नानारूपेण (अभ्रे) जलधारके मेघे (चरन्ति) (तासाम्) (आज्यम्) घृतम्। सारपदार्थम् (पुरुषः) (वर्षम्) वृष्टिजलम् (आपः) आप्ताः प्रजाः-दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७ ॥