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अ॒र्वाग॒न्यः प॒रो अ॒न्यो दि॒वस्पृ॒ष्ठाद्गुहा॑ नि॒धी निहि॑तौ॒ ब्राह्म॑णस्य। तौ र॑क्षति॒ तप॑सा ब्रह्मचा॒री तत्केव॑लं कृणुते॒ ब्रह्म॑ वि॒द्वान् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अर्वाक् । अन्य: । पर: । अन्य: । दिव: । पृष्ठात् । गुहा । निधी इति । निऽधी । निऽहितौ । ब्राह्मणस्य । तौ । रक्षति । तपसा । ब्रह्मऽचारी । तत् । केवलम् । कृणुते । ब्रह्म । विद्वान् ॥७.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्राह्मणस्य) ब्रह्मज्ञान के (निधी) दो निधि [कोश] (गुहा) गुहा [गुप्त दशा] में (निहितौ) गढ़े हैं, (अन्यः) एक (अर्वाक्) समीपवर्ती और (अन्यः) दूसरा (दिवः) सूर्य की (पृष्ठात्) पीठ [उपरिभाग] से (परः) परे [दूर] है। (तौ) उन दोनों [निधियों] को (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी (तपसा) अपने तप से (रक्षति) रखता है, (ब्रह्म) ब्रह्म [परमात्मा] को (विद्वान्) जानता हुआ वह (तत्) उस [ब्रह्म] को (केवलम्) केवल [सेवनीय, निश्चित] (कृणुते) कर लेता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का ज्ञान निकट और दूर अवस्था में रहकर सब स्थानों में वर्तमान है, अनन्यवृत्ति, ब्रह्मचारी योगी तप की महिमा से ब्रह्म का साक्षात् करके और उसकी शरण में रहकर अपनी शक्तियाँ बढ़ाता है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(अर्वाक्) समीपवर्ती (अन्यः) एको निधिः (परः) परस्तात्। दूरम् (अन्यः) अपरः (दिवः) सूर्यस्य (पृष्ठात्) उपरिभागात् (गुहा) गुहायाम्। गुप्तदशायाम् (निधी) धनकोशौ (निहितौ) निक्षिप्तौ (ब्राह्मणस्य) ब्रह्मसम्बन्धिज्ञानस्य (तौ) निधी (रक्षति) (तपसा) (ब्रह्मचारी) (तत्) ब्रह्म (केवलम्) अ० ३।१८।२। सेवनीयम्। निश्चितम् (कृणुते) करोति (ब्रह्म) परमात्मानम् (विद्वान्) विदन्। जानन् ॥