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ब्रह्मचा॒रीष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न्दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति। स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॑चा॒र्यं तप॑सा पिपर्ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ब्रह्मऽचारी । इष्णन् । चरति । रोदसी इति । उभे इति । तस्मिन् । देवा: । सम्ऽमनस: । भवन्ति । स: । दाधार । पृथिवीम् । दिवम् । च । स: । आऽचार्यम् । तपसा । पिपर्ति ॥७.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी [वेदपाठी और वीर्यनिग्राहक पुरुष] (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य और पृथिवी को (इष्णन्) लगातार खोजता हुआ (चरति) विचरता है, (तस्मिन्) उस [ब्रह्मचारी] में (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (संमनसः) एक मन (भवन्ति) होते हैं। (सः) उस ने (पृथिवीम्) पृथिवी (च) और (दिवम्) सूर्यलोक को (दाधार) धारण किया है [उपयोगी बनाया है], (सः) वह (आचार्यम्) आचार्य [साङ्गोपाङ्ग वेदों के पढ़ानेवाले पुरुष] को (तपसा) अपने तप से (पिपर्ति) परिपूर्ण करता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी वेदाध्ययन और इन्द्रियदमनरूप तपोबल से सब सूर्य, पृथिवी आदि स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान पाकर और सबसे उपकार लेकर विद्वानों को प्रसन्न करता हुआ वेदविद्या के प्रचार से आचार्य का इष्ट सिद्ध करता है ॥१॥
टिप्पणी: १−भगवान् पतञ्जलि मुनि ने इस सूक्त का सारांश लेकर कहा है−[ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः−योगदर्शन, पाद २ सूत्र ३८] (ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाम्) ब्रह्मचर्य [वेदों के विचार और जितेन्द्रियता] के अभ्यास में (वीर्यलाभः) वीर्य [वीरता अर्थात् धैर्य, शरीर, इन्द्रिय और मन के निरतिशय सामर्थ्य] का लाभ होता है ॥२−भगवान् मनु ने आचार्य का लक्षण इस प्रकार किया है−[उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः। संकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते-मनुस्मृति, अध्याय २ श्लोक १४०] ॥जो द्विज [ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य] शिष्य का उपनयन करके कल्प [यज्ञ आदि संस्कार विधि] और रहस्य [उपनिषद् आदि ब्रह्मविद्या] के साथ वेद पढ़ावे, उसकोआचार्य कहते हैं ॥१−(ब्रह्मचारी) अ० ५।१७।५। ब्रह्म+चर गतिभक्षणयोः-आवश्यके णिनि। ब्रह्मणे वेदाय वीर्यनिग्रहाय च चरणशीलः पुरुषः (इष्णन्) इष आभीक्ष्णे-शतृ। पुनः पुनरन्विच्छन् (चरति) विचरति। प्रवर्त्तते (रोदसी) अ० ४।१।४। द्यावापृथिव्यौ (उभे) (तस्मिन्) ब्रह्मचारिणि (देवाः) विजिगीषवः (संमनसः) समानमनस्काः (भवन्ति) (सः) ब्रह्मचारी (दाधार) धृतवान् (पृथिवीम्) (दिवम्) सूर्यलोकम् (च) (सः) (आचार्यम्) चरेराङि चागुरौ। वा० पा० ३।१।१००। इति प्राप्ते। ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। आङ्+चर गतिभक्षणयोः-ण्यत्। आचार्यः कस्मादाचार्य आचारं ग्राहयत्याचिनोत्यर्थानाचिनोति बुद्धिमिति वा०-निरु० १।४। साङ्गोपाङ्गवेदाध्यापकं द्विजम् (तपसा) इन्द्रियनिग्रहेण (पिपर्ति) पॄ पालनपूरणयोः। पूरयति ॥