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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राण) हे प्राण ! [जीवनदाता परमेश्वर] (ते) तेरी (या) जो (प्रिया) प्रीति करनेवाली (यो) और जो, (प्राण) हे प्राण ! (ते) तेरी (प्रेयसी) अधिक प्रीति करनेवाली (तनूः) उपकार क्रिया है। (अथो) और भी (यत्) जो (तव) तेरा (भेषजम्) भयनिवारक कर्म है, (तस्य) उसका (नः) हमारे (जीवसे) जीवन के लिये (धेहि) दान कर ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमेश्वर के उपकारों को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं, वह अपना जीवन बढ़ाते हैं ॥९॥
टिप्पणी: ९−(या) (ते) तव (प्राण) (प्रिया) प्रीतिकरी (तनूः) तन उपकारे-ऊ। उपकारक्रिया (यो) या-उ। या च (प्रेयसी) प्रिय-ईयसुन्, प्रादेशः। प्रियतरा (अथो) अपि च (भेषजम्) भयनिवारकं कर्म (तस्य) (नः) अस्माकम् (धेहि) डुधाञ् दाने। दानं कुरु (जीवसे) जीवनवर्धनाय। अन्यद् गतम् ॥
