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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदा) जब (प्राणः) [जीवनदाता परमेश्वर] ने (वर्षेण) वर्षा द्वारा (महीम्) विशाल (पृथिवीम्) पृथिवी को (अभ्यवर्षीत्) सींच दिया, (तत्) तब (पशवः) जीव-जन्तु (प्र मोदन्ते) बड़ा हर्ष मनाते हैं−“(नः) हमारी (महः) बढ़ती (वै) अवश्य (भविष्यति) होगी ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर की शक्ति से वृष्टि होने पर सब प्राणी बलवृद्धि कर के उत्सव मनाते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(यदा) यस्मिन् काले (प्राणः) म० १। जीवनदाता परमेश्वरः (अभ्यवर्षीत्) अभिषिक्तवान् (पृथिवीम्) भूमिम्। (महीम्) विशालाम् (पशवः) सर्वे जीवजन्तवः (तत्) तदा (प्रमोदन्ते) (प्रहृष्यन्ति) (महः) वर्धनम् (वै) खलु (नः) अस्माकम् (भविष्यति) ॥
