पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] (ऋतौआगते) ऋतुकाल आने पर (ओषधीः) ओषधियों [अन्न आदि] को (अभिक्रन्दति) बल से पुकारता है, (तदा) तब (सर्वम्) सब [जगत्] (प्र मोदते) बड़ा आनन्द मानता है, (यत् किम् च) जो कुछ भी (भूम्याम् अधि) भूमि पर है ॥४॥
भावार्थभाषाः - उचित समय पर वर्षा होने से सब चर और अचर जगत् बल प्राप्त करके प्रसन्न होता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(यत्) यदा (प्राणः) म० १ (ऋतौ) ऋतुकाले वर्षतौ (आगते) प्राप्ते (अभिक्रन्दति) (ओषधीः) म० ३। (सर्वम्) चराचरं जगत् (तदा) (प्र मोदते) अत्यन्तं हृष्यति (यत्) (किम् च) किमपि (भूम्याम्) (अधि) उपरि ॥
