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प्राण॒ मा मत्प॒र्यावृ॑तो॒ न मद॒न्यो भ॑विष्यसि। अ॒पां गर्भ॑मिव जी॒वसे॒ प्राण॑ ब॒ध्नामि॑ त्वा॒ मयि॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्राण । मा । मत् । परिऽआवृत: । न । मत् । अन्य: । भविष्यसि । अपाम् । गर्भम्ऽइव । जीवसे । प्राण । बध्नामि । त्वा । मयि ॥६.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

प्राण की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्राण) हे प्राण ! [जीवनदाता परमेश्वर] (मत्) मुझ से (पर्यावृतः) पृथक् वर्तमान (मा) मत [हो] तू, (मत्) मुझ से (अन्यः) अन्य (न भविष्यसि) न होगा। (प्राण) हे प्राण ! [जीवनदाता परमेश्वर] (अपाम्) प्राणियों [वा जल] के (गर्भम् इव) गर्भ के समान (त्वा) तुझको (जीवसे) [अपने] जीवन के लिये (मयि) अपने में (बध्नामि) बाँधता हूँ ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जैसे गर्भ प्राणियों में और अग्नि, जल के भीतर चेष्टा करता है, वैसे ही मनुष्य परमात्मा को हृदय में धारण करके उन्नति करे ॥२६॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २६−(प्राण) हे प्राणप्रद परमेश्वर (मा) निषेधे (मत्) मत्तः (पर्यावृतः) वृञ् वरणे-क्त। पृथग् वेष्टितः (न) निषेधे (मत्) (अन्यः) पृथग्भूतः (भविष्यसि) (अपाम्) प्राणिनाम्। जलानां वा (गर्भम्) उदरस्थं सन्तानम्, गर्भवद् वर्तमानं जलं वा (इव) यथा (जीवसे) जीवनाय (प्राण) (बध्नामि) धरामि (त्वा) त्वाम् (मयि) आत्मीये ॥