0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुप्तेषु) सोते हुए [प्राणियों] पर वह [प्राण, परमात्मा] (ऊर्ध्वः) ऊपर रहकर (जागार) जागता है, और (ननु) कभी नहीं (तिर्यङ्) तिरछा [होकर] (नि पद्यते) गिरता है। (कः चन) किसी ने भी (सुप्तेषु) सोते हुओं में (अस्य) इस [प्राण परमात्मा] का (सुप्तम्) सोना (न अनु शुश्राव) कभी [परम्परा से] नहीं सुना ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जैसे परमात्मा चेतन्य रहकर सर्वदा सब प्राणियों की सुधि रखता है, वैसे ही मनुष्यों को निरालस होकर पुरुषार्थ करना चाहिये ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(ऊर्ध्वः) उपरि स्थितः सन् (सुप्तेषु) निद्रागतेषु (जागार) लडर्थे लिट्। जागर्ति (ननु) नैव (तिर्यङ्) तिर्यगवस्थितः सन् (निपद्यते) नि पतति (न) निषेधे (सुप्तम्) सुप्तिः (अस्य) प्राणस्य परमेश्वरस्य (सुप्तेषु) (अनु) अनुक्रमेण। परम्परया (शुश्राव) श्रुतवान् (कश्चन) कोऽपि पुरुषः ॥
